रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट 👹👹 : स्वामी विवेकानंद आज भी हमारे बीच मौजूद हैं-शशांक पाण्डेय
Laxman Singh Bisht
Fri, Jul 4, 2025
स्वामी विवेकानंद आज भी हमारे बीच मौजूद हैं-शशांक पाण्डेय
(स्वामी विवेकानंद पुण्य तिथि पर विशेष आलेख)
4 जुलाई 1902 – यह तिथि भारतवर्ष के लिए केवल एक पुण्यतिथि नहीं है, यह उस युगान्तकारी क्षण की याद है जब स्वामी विवेकानंद ने अपने नश्वर शरीर को त्यागा, पर अपने विचारों से करोड़ों लोगों के हृदय में सदा के लिए अमर हो गए।(लेखक शशांक पाण्डेय रामकृष्ण मिशन बेलूरमठ एवं अद्वैत आश्रम मायावती से जुड़े हुए हैं)
स्वामी विवेकानंद वो ज्योति थे, जिन्होंने धर्म को सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि कर्म, चरित्र और राष्ट्र सेवा से जोड़ा। उन्होंने भारत को उसके आत्मसम्मान से फिर से परिचित कराया, और दुनिया को बताया कि भारत केवल भूमि नहीं, संस्कृति और चेतना का महासागर है।
स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ। बचपन में वे नरेंद्रनाथ दत्त थे — जिज्ञासु, साहसी, सत्य के प्यासे।
वे जब रामकृष्ण परमहंस से मिले, तो आध्यात्मिक साधना की वह नदी जाग उठी, जो आगे चलकर पूरे भारत और विश्व को भिगोने वाली थी।
उन्होंने कहा था:
“हमारा धर्म केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह खेतों, स्कूलों, कारखानों और गाँवों तक पहुँचना चाहिए।”
1893 में शिकागो के धर्म संसद में जब स्वामी विवेकानंद ने कहा –
“सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका…”
तो यह केवल एक संबोधन नहीं था, यह वह पल था जब भारत की आत्मा ने पश्चिम की सभ्यता को नमस्कार किया। उनके विचारों ने पूर्व और पश्चिम के बीच एक सेतु बना दिया — एक ऐसा सेतु, जिसमें भारत की आध्यात्मिकता और मानवता की सार्वभौमिकता समाहित थी।
बहुत कम लोगों को पता है कि स्वामी विवेकानंद का एक गहरा संबंध उत्तराखंड के पहाड़ों से भी रहा।
जब वे हिमालय की ओर एकांत और ध्यान की खोज में निकले, तब उन्हें चंपावत जिले के लोहाघाट क्षेत्र की पावन भूमि अत्यंत प्रिय लगी। यहीं, उन्होंने 1899 में ‘अद्वैत आश्रम मायावती’ की स्थापना की — एक ऐसा आश्रम जहाँ कोई मूर्ति नहीं, कोई पूजा-पद्धति नहीं, केवल शुद्ध वेदांत का अभ्यास, सेवा और आत्मिक उन्नयन होता है।
यह आश्रम आज भी रामकृष्ण मिशन का केंद्र है और विवेकानंद जी के मौन ध्यान और आत्मनिष्ठा की दिव्य स्मृति है।
लोहाघाट की यह धरती, उस साधक की चुप्पी को अब भी सुनती है।
आज जब हम 4 जुलाई को विवेकानंद जी को श्रद्धांजलि देते हैं, तो यह केवल अतीत को याद करने का दिन नहीं है — यह भविष्य को दिशा देने का दिन है।
वो कहते थे –
“तुम स्वयं को निर्बल मानोगे, तो संसार भी तुम्हें वही मानेगा। लेकिन जब तुम कहोगे – मैं शक्तिशाली हूँ, मैं परिवर्तन ला सकता हूँ – तभी युग बदलेगा।”
स्वामी विवेकानंद ने भारत की युवा शक्ति में असीम विश्वास रखा।
आज आवश्यकता है कि हम शिक्षा को केवल डिग्री नहीं, चरित्र निर्माण का साधन बनाएं। उनके विचार Whatsapp स्टेटस तक सीमित न हों — वे हमारे व्यवहार, सोच और कर्म में उतरें।
नमन है उस संन्यासी को—
जो आग की तरह बोले
पर शांति की तरह जिए,
जो भारत के लिए जले
पर विश्व को भी रौशन कर गए।
स्वामी विवेकानंद आज भी हमारे बीच जीवित हैं —
विचारों में, किताबों में, और उन युवाओं के संकल्प में,
जो बदलाव की लौ जलाना चाहते हैं।