रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट 👹👹 : लोहाघाट:उत्तराखण्ड में प्रकृति का वरदान एवं परीक्षाओं की पहचान है मानसून-शशांक पाण्डेय*
Laxman Singh Bisht
Tue, Jul 1, 2025
*उत्तराखण्ड में प्रकृति का वरदान एवं परीक्षाओं की पहचान है मानसून-शशांक पाण्डेय
उत्तराखण्ड, भारत का एक पर्वतीय राज्य, जो अपनी अनुपम प्राकृतिक सुंदरता, आध्यात्मिक महत्व और जैव विविधता के लिए जाना जाता है, मानसूनी वर्षा पर अत्यधिक निर्भर है। यहां के जीवन, खेती, वन, जल-स्रोत, पशुधन और पर्यटन सभी पर मानसून का गहरा प्रभाव पड़ता है। यह वर्षा ऋतु राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, लेकिन साथ ही यह अनेक प्राकृतिक आपदाओं और समस्याओं की जननी भी बन जाती है।
(लेखक सामाजिक विज्ञान के शिक्षक है)
1-मानसून का आगमन: वर्षा की पहली दस्तक*
उत्तराखण्ड में दक्षिण-पश्चिम मानसून आमतौर पर जून के अंत या जुलाई की शुरुआत में प्रवेश करता है। यह मानसून बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से नमी लेकर आता है और सबसे पहले राज्य के तराई क्षेत्रों में दस्तक देता है। इसके बाद यह धीरे-धीरे पहाड़ी क्षेत्रों—अल्मोड़ा, नैनीताल, टिहरी, चमोली, पिथौरागढ़, बागेश्वर आदि में सक्रिय होता है।
*2-कृषि जीवन पर मानसून का प्रभाव*
उत्तराखण्ड एक कृषि प्रधान राज्य है और यहाँ की खेती वर्षा पर निर्भर करती है। राज्य की लगभग 70 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, जो सीधे तौर पर खेती और पशुपालन पर निर्भर है। धान, मक्का, मंडुवा, झंगोरा जैसी पारंपरिक फसलें मानसून पर आधारित होती हैं।यदि वर्षा समय पर और संतुलित हो, तो अच्छी फसल होती है।असमय या अत्यधिक वर्षा किसानों के लिए आपदा बन जाती है।खेती के अलावा पशुओं के लिए चारा उत्पादन भी मानसून पर निर्भर करता है।
3. आपदाएँ और मानसून की चुनौतियाँ*
उत्तराखण्ड की भौगोलिक बनावट और कमजोर पर्वतीय ढाँचों के कारण मानसून के मौसम में आपदाओं का खतरा बहुत बढ़ जाता है।
प्रमुख आपदाएँ:
• भूस्खलन (Landslides): बारिश के दौरान पहाड़ों से मलबा गिरना आम बात है, जिससे सड़कें बाधित होती हैं, जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।
-बादल फटना (Cloudburst): 2013 की केदारनाथ आपदा इसकी सबसे भयावह मिसाल है।
-नदियों में बाढ़: मानसून में गौला, कोसी, रामगंगा, सरयू, मंदाकिनी, भागीरथी जैसी नदियाँ उफान पर आ जाती हैं। कई बार गांवों में पानी भर जाता है और पुल बह जाते हैं।
-सड़क कटाव और यातायात बाधा: पहाड़ी क्षेत्रों में सड़कों का टूटना आम बात है, जिससे यात्रियों और स्थानीय जनता को परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
*4-मानसून और पर्यावरणीय संतुलन*
मानसून सिर्फ चुनौतियाँ ही नहीं, बल्कि पर्यावरण के लिए संजीवनी भी है।यह वनस्पतियों को जीवन देता है और बंजर ज़मीन को हरियाली में बदल देता है।
भूजल स्तर को बनाए रखने में मदद करता है।झीलों, जलाशयों, नदियों और प्राकृतिक जलस्रोतों को पुनः भरता है।
वन्यजीवों की जैव विविधता भी वर्षा पर निर्भर करती है।
*5. पर्यटन पर मानसून का असर*
उत्तराखण्ड का पर्यटन क्षेत्र वर्ष भर पर्यटकों से गुलजार रहता है, लेकिन मानसून में यहाँ का सौंदर्य और भी निखर जाता है। हरे-भरे पहाड़, झरते झरने, बहती नदियाँ, ताज़ी हवा—यह सब पर्यटकों को आकर्षित करता है।
हालाँकि मानसून के समय यात्रा जोखिमपूर्ण हो जाती है क्योंकि:
• रास्ते बंद हो सकते हैं
• भूस्खलन का खतरा रहता है
• मौसम का पूर्वानुमान बदल सकता है
फिर भी कई स्थान मानसून में भी पर्यटकों के लिए खास रहते हैं।
*6. सरकार और समाज की भूमिका*
• सरकार मानसून से पहले आपदा प्रबंधन योजनाएँ बनाती है।NDRF और SDRF की टीमें सक्रिय रहती हैं।मौसम विभाग की भविष्यवाणियाँ और राहत शिविरों की व्यवस्था से हानि को कम किया जा सकता है।समाज का भी कर्तव्य है कि वह प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, प्लास्टिक का कम प्रयोग, और वृक्षारोपण जैसे कार्यों में भागीदारी करे।
*निष्कर्ष*
उत्तराखण्ड में मानसून केवल एक मौसम नहीं, जीवन का मूल आधार है। यह अन्न देता है, जल देता है, जंगलों को जीवित रखता है और राज्य की संस्कृति और सभ्यता को सींचता है।
परंतु यह मानसून कई बार चेतावनी भी लेकर आता है—यदि हम प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करेंगे, अंधाधुंध विकास करेंगे, वनों की कटाई करेंगे, तो यह वरदान विनाश में बदल सकता है।
हमें मानसून का स्वागत भी करना है, और इससे सावधानीपूर्वक निपटना भी।
“उत्तराखण्ड का मानसून जीवन की धड़कन है—यह हमें जीना सिखाता है, पर संभलकर।”
(लेखक लोहाघाट(चम्पावत) निवासी एवं सामाजिक विज्ञान के शिक्षक है)