रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट 👹👹 : उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, दो वोटर लिस्ट में नाम वाले नहीं लड़ सकेंगे पंचायत चुनाव
Laxman Singh Bisht
Fri, Jul 11, 2025
हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, दो वोटर लिस्ट में नाम वाले नहीं लड़ सकेंगे पंचायत चुनाव 
उत्तराखंड में पंचायत चुनाव प्रक्रिया के बीच इस वक्त की सबसे बड़ी खबर नैनीताल हाईकोर्ट से आ रहा है हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति एक वोटर कार्ड के नियम पर बड़ा फैसला देते हुए राज्य निर्वाचन आयोग के आदेश को निरस्त कर दिया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है अगर किसी व्यक्ति का नाम पंचायत और नगर निकाय — दोनों की वोटर लिस्ट में दर्ज है, तो वह ना तो पंचायत चुनाव लड़ सकेगा और ना ही दोनों चुनावों में वोट दे सकेगा। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने यह फैसला उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने समाजसेवी शक्ति सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए जारी किया। कोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग के उस पत्र पर भी रोक लगा दी है जिसमें दोहरी वोटर लिस्ट में नाम होने के बावजूद चुनाव लड़ने की अनुमति दी गई थी। हालांकि हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि अंतिम फैसला निर्वाचन आयोग को लेना है कि क्या वह हाईकोर्ट के फैसले का सम्मान करते हुए इस आदेश को लागू करता है और दुबारा से नामांकन पत्रों की जांच करता है या फिर अवमानना की स्थिति आती है।त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में कई जगह ऐसे उम्मीदवार सामने आए जिनका नाम नगर निकाय और पंचायत दोनों मतदाता सूचियों में दर्ज था। कुछ जिलों में ऐसे प्रत्याशियों के नामांकन रद्द कर दिए गए, जबकि कुछ जगह उन्हें नामांकन की अनुमति मिल गई। इससे भ्रम की स्थिति पैदा हो गई थी। इस संबंध में शक्ति सिंह बर्त्वाल ने इस मुद्दे को गंभीर मानते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उनका कहना था कि निर्वाचन आयोग दोहरी वोटर लिस्ट वाले प्रत्याशियों को किस आधार पर चुनाव लड़ने की छूट दे रहा है, जबकि ऐसा करना कानूनन गलत है।
मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि एक व्यक्ति का नाम दो अलग-अलग निकायों की वोटर लिस्ट में होना गलत है और ऐसे लोगों को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि उसके द्वारा जारी पत्र कानून की भावना के विरुद्ध है और इस पर तत्काल रोक लगाई जाती है।
याचिकाकर्ता ने आयोग को पहले भी 7 और 8 जुलाई को पत्र लिखकर यह मांग की थी कि ऐसे मतदाताओं को नामांकन और मतदान प्रक्रिया से रोका जाए, लेकिन जब कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला, तो मामला अदालत पहुंचा।याचिका में यह भी कहा गया कि पंचायती राज अधिनियम की धारा 9 (6) और (7) का पालन नहीं किया जा रहा है, जबकि ये धाराएं साफ तौर पर इस स्थिति को अयोग्य करार देती हैं।