भारत एक ऐसा देश है जहाँ हर ऋतु, हर क्षेत्र, हर संस्कृति के अपने-अपने त्योहार हैं। इन्हीं में से एक पर्व उत्तराखंड की धरती पर विशेष श्रद्धा, प्रेम और आस्था के साथ मनाया जाता है – हरेला पर्व। यह पर्व न केवल धार्मिक भावनाओं से जुड़ा है, बल्कि प्रकृति, कृषि, पर्यावरण और सांस्कृतिक अस्मिता से भी गहराई से संबंधित है।जहाँ एक ओर यह नवजीवन, हरियाली और समृद्धि का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि मानव और प्रकृति का रिश्ता कितना गहरा, पवित्र और परस्पर निर्भर है।हरेला का शाब्दिक और सांस्कृतिक अर्थ है – हरियाली। यह पर्व विशेष रूप से कुमाऊं अंचल में मनाया जाता है, लेकिन आज इसके महत्व को देखते हुए यह धीरे-धीरे पूरे उत्तराखंड और देश के अन्य हिस्सों में भी पहचान बना रहा है।
यह पर्व सावन महीने में मनाया जाता है जब मानसून अपने चरम पर होता है और धरती हरियाली से भर जाती है। यह पर्व वर्षा ऋतु के स्वागत और कृषि चक्र की शुरुआत का संकेत देता है।हरेला पर्व का संबंध भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह से भी जोड़ा जाता है। इस प्रसंग को उमंग, समर्पण और नवजीवन की शुरुआत के रूप में देखा जाता है।पारंपरिक रूप से यह पर्व खेती-किसानी करने वाले लोगों के लिए एक नई कृषि ऋतु की शुरुआत और प्रकृति के प्रति आभार का अवसर होता है। हरेला पर्व से लगभग 9-10 दिन पहले घरों में गेंहूं, मक्का, जौ, तिल आदि के बीजों को मिट्टी की छोटी टोकरियों या गमलों में बोया जाता है। इन्हें प्रतिदिन पानी दिया जाता है।हरेला पर्व वाले दिन ये बीज 4 से 6 इंच लंबे हो जाते हैं – इन्हें ही “हरेला” कहा जाता है। इस हरेले को काटकर घर के सभी सदस्य एक-दूसरे को सिर पर रखकर आशीर्वाद देते हैं। खासतौर पर बड़े-बुजुर्ग बच्चों को हरेला सिर पर रखते है। यह परंपरा केवल आशीर्वाद नहीं है, बल्कि एक संस्कार है – जो अगली पीढ़ी को हरियाली, समृद्धि और पारिवारिक मूल्यों का संदेश देती है।हरेला केवल एक व्यक्तिगत उत्सव नहीं है, यह सामूहिक आनंद और लोक संस्कृति का उत्सव है। इस दिन महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं, जिनमें हरियाली, ऋतु परिवर्तन, परिवार की सुख-समृद्धि और प्रकृति की स्तुति की जाती है।इन गीतों में आस्था, मौसम विज्ञान, परंपरा और सौंदर्यबोध का अद्भुत समन्वय होता है।वर्तमान युग में जब जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, ग्लोबल वॉर्मिंग और पर्यावरण प्रदूषण जैसे संकट विकराल रूप ले चुके हैं, तब हरेला पर्व की प्रासंगिकता और भी अधिक बढ़ जाती है। उत्तराखंड सरकार और स्थानीय संस्थाओं ने हरेला पर्व को “वृक्षारोपण महोत्सव” के रूप में मनाने की परंपरा शुरू की है। हरेला हमें याद दिलाता है कि धरती माँ की सेवा ही असली पूजा है। बच्चे इस पर्व को बहुत उत्साह से मनाते हैं। बीज बोने से लेकर पौधे काटने और पर्यावरण संबंधित गतिविधियों में भाग लेने तक – उन्हें प्रकृति से जोड़ने का यह एक सरल, सशक्त और संस्कारयुक्त माध्यम है। इससे उन्हें यह शिक्षा मिलती है कि हरियाली केवल खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि विचारों, संस्कारों और जीवन दृष्टिकोण में भी होनी चाहिए।
उत्तराखंड सरकार हरेला को केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि विकास और जनजागरण के अभियान से भी जोड़ चुकी है।मुख्यमंत्री से लेकर ग्राम प्रधान तक, सभी इस दिन पौधरोपण कर एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।हरेला पर्व उत्तराखंड की आस्था, पर्यावरण, परंपरा, और भविष्य दृष्टि का जीवंत प्रतीक है। यह पर्व हमें सिखाता है कि हरियाली केवल पेड़ों की नहीं, रिश्तों, विचारों, और कर्मों की भी होनी चाहिए।आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है, तब उत्तराखंड का यह पर्व एक प्रेरणा स्रोत बन सकता है – जो हमें प्रकृति से जुड़ने, उसे संवारने और उसके साथ सामंजस्य से जीने का मार्ग दिखाता है।आइए, इस हरेला पर एक पेड़ जरूर लगाएं,लेकिन उससे भी पहले, अपने भीतर हरियाली जगाएं।