रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट : चम्पावत के भाषा शिक्षकों का दिल्ली में सम्मान कुमाऊँनी भाषा के संरक्षण व संवर्धन के प्रयासों की दिल्ली में सराहना
चम्पावत के भाषा शिक्षकों का दिल्ली में सम्मान
कुमाऊँनी भाषा के संरक्षण एवं संवर्धन के प्रयासों को नई दिल्ली में मिली सराहना

नई दिल्ली। कुमाऊँनी भाषा के संरक्षण, संवर्धन एवं नई पीढ़ी को अपनी लोकभाषा और संस्कृति से जोड़ने की दिशा में चम्पावत जनपद में किए जा रहे उल्लेखनीय प्रयासों को नई दिल्ली में आयोजित शिक्षक सम्मान समारोह–2026 में विशेष पहचान मिली। NDMC कन्वेंशन सेंटर, संसद मार्ग, नई दिल्ली में आयोजित गरिमामय समारोह में चम्पावत जनपद के भाषा शिक्षकों एवं भाषा सेवकों को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया गया।समारोह के मुख्य अतिथि उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी रहे। उन्होंने चम्पावत एवं अल्मोड़ा जनपद से आए भाषा शिक्षकों तथा कार्यकर्ताओं के प्रयासों की मुक्त कंठ से सराहना करते हुए कहा कि लोकभाषाओं का संरक्षण केवल भाषा को बचाने का कार्य नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, परंपरा और जड़ों को सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण दायित्व है।मुख्य अतिथि ने विशेष रूप से दूरस्थ जनपद चम्पावत में विद्यालय स्तर पर संचालित किए जा रहे कुमाऊँनी भाषा शिक्षण केंद्रों एवं कक्षाओं की सराहना की। उन्होंने कहा कि सीमित संसाधनों और भौगोलिक चुनौतियों के बावजूद जिस समर्पण के साथ भाषा शिक्षण का कार्य किया जा रहा है, वह अनुकरणीय है।समारोह के आयोजकों ने भी चम्पावत जैसे दूरस्थ जनपद में चलाए जा रहे भाषा केंद्रों की उत्कृष्टता और वहां के शिक्षकों की सक्रिय भूमिका की प्रशंसा की। वक्ताओं ने कहा कि यदि लोकभाषाओं को आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाना है तो विद्यालयों को इसके लिए महत्वपूर्ण माध्यम बनाना होगा।
(विद्यालयों में कुमाऊँनी भाषा की कक्षाएँ
चम्पावत जनपद में भाषा संरक्षण अभियान के अंतर्गत विभिन्न विद्यालयों में कुमाऊँनी भाषा की कक्षाएँ संचालित की जा रही हैं। इन कक्षाओं में विद्यार्थियों को केवल कुमाऊँनी भाषा ही नहीं, बल्कि लोकगीत, लोककथाएँ, लोकसाहित्य, पारंपरिक शब्दावली, लोक परंपराएँ और क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से भी परिचित कराया जा रहा है।इस पहल का उद्देश्य बच्चों को अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना तथा कुमाऊँनी भाषा को विद्यालय स्तर पर जीवंत एवं व्यवहारिक बनाए रखना है। भाषा शिक्षकों का मानना है कि जिस भाषा में हमारी लोकस्मृतियां, लोकगीत, कहावतें और पीढ़ियों का अनुभव सुरक्षित है, उसका संरक्षण समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
(उत्तराखण्ड की लोकभाषाओं के संरक्षण का अभियान)
कार्यक्रम का आयोजन उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली एवं दिल्ली पैरामेडिकल एंड मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट (DPMI) के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।मंच द्वारा उत्तराखण्ड की प्रमुख लोकभाषाओं कुमाऊँनी, गढ़वाली एवं जौनसारी के संरक्षण, संवर्धन और शिक्षण के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं। इसी अभियान के अंतर्गत विद्यालयों में भाषा शिक्षण केंद्रों को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि बच्चे अपनी लोकभाषा को पढ़ने, लिखने और बोलने के साथ-साथ उससे जुड़ी संस्कृति को भी समझ सकें।
(चम्पावत से इन भाषा सेवकों को मिला सम्मान)
समारोह में चम्पावत अल्मोड़ा जनपद से—भूपेंद्र सिंह देव ‘ताऊजी’, उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी;जनार्दन चिल्कोटी, आरसेटी के पूर्व निदेशक एवं जिला संयोजक, कुमाऊँनी भाषा-साहित्य प्रचार समिति;सतीश जोशी, ऋतेश कुमार वर्मा, जनार्दन प्रसाद गड़कोटी, गौरव बंसल, नितिन देव, तुलसी भट्ट, जीवन तिवारी, पुष्पा पाटनी, सीमा जोशी, तुलसी बिष्ट, हेमा बिष्ट, ममता बिष्ट एवं कृपाल सिंह शीलाको सम्मान-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।इन सभी भाषा शिक्षकों एवं भाषा सेवकों द्वारा कुमाऊँनी भाषा के प्रचार-प्रसार और नई पीढ़ी को अपनी लोकसंस्कृति से जोड़ने के लिए किए जा रहे प्रयासों को समारोह में विशेष रूप से रेखांकित किया गया।
(चम्पावत के लिए गौरव का क्षण)
नई दिल्ली के राष्ट्रीय स्तर के मंच पर चम्पावत के भाषा शिक्षकों को मिला यह सम्मान पूरे जनपद के लिए गौरव का विषय है। विशेष रूप से दूरस्थ क्षेत्रों में विद्यालयों के माध्यम से कुमाऊँनी भाषा की कक्षाएँ चलाना इस बात का प्रमाण है कि इच्छाशक्ति और समर्पण के साथ लोकभाषा संरक्षण का अभियान जन-जन तक पहुंचाया जा सकता है।भाषा विशेषज्ञों और आयोजकों ने कहा कि लोकभाषाएँ केवल संवाद का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे किसी समाज के इतिहास, लोकस्मृति, परंपरा, संस्कृति और सामूहिक पहचान की जीवंत धरोहर होती हैं। इसलिए इनके संरक्षण के लिए विद्यालय, समाज और परिवार—तीनों को मिलकर काम करना होगा।समारोह में चम्पावत और अल्मोड़ा के शिक्षकों के प्रयासों की सराहना को उपस्थित लोगों ने लोकभाषा संरक्षण के अभियान के लिए उत्साहवर्धक बताया। यह सम्मान निश्चित रूप से चम्पावत में चल रहे भाषा संरक्षण अभियान को नई ऊर्जा देगा और आने वाली पीढ़ी को अपनी मातृभाषा तथा सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
“भाषा केवल शब्द नहीं, हमारी पहचान है। लोकभाषा बचेगी तो लोकसंस्कृति, लोकस्मृति और हमारी जड़ें भी सुरक्षित रहेंगी।”
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