रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट : लोहाघाट:निस्संतान दंपतियों के लिए आस्था और विश्वास का पवित्र धाम है झूमाधुरी मंदिर:शशांक पाण्डेय
Laxman Singh Bisht
निस्संतान दंपतियों के लिए आस्था और विश्वास का पवित्र धाम है झूमाधुरी मंदिर:शशांक पाण्डेय

चम्पावत जनपद के ग्राम पाटन पाटनी में विराजमान झूमाधुरी मैया का मंदिर सैकड़ों सालों से श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। पहाड़ की ऊंची चोटी पर प्राकृतिक सौंदर्य के बीच स्थित यह पवित्र धाम अपने धार्मिक महत्व के साथ-साथ यहां से जुड़ी लोक मान्यताओं के लिए भी विशेष पहचान रखता है। मां झूमाधुरी के दरबार में दूर-दूर से श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं। खास तौर पर निस्संतान दंपतियों के बीच झूमाधुरी मैया के प्रति गहरी आस्था देखने को मिलती है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि सच्चे मन से मां की आराधना करने वाले भक्तों को मैया कभी निराश नहीं करतीं।
झूमाधुरी मैया को क्षेत्र में संतान सुख प्रदान करने वाली देवी के रूप में विशेष श्रद्धा प्राप्त है। वर्षों से चली आ रही लोक मान्यताओं और बुजुर्गों से सुनी गई कथाओं ने इस विश्वास को और मजबूत किया है। कहा जाता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व एक महिला संतान प्राप्ति की इच्छा लेकर झूमाधुरी मैया की शरण में पहुंची थी। उसने पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ मां की आराधना की। लोकविश्वास के अनुसार मैया की कृपा से उसकी गोद भर गई। इसके बाद से ही झूमाधुरी मैया को संतान सुख की कामना रखने वाले दंपतियों के लिए विशेष आस्था का केंद्र माना जाने लगा। आज भी नंदाष्टमी के अवसर पर झूमाधुरी धाम में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के बीच इस लोकविश्वास की गहरी छाप देखने को मिलती है। कई परिवार वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार मां के दरबार में पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं। श्रद्धालु दीप प्रज्ज्वलित कर मां से परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और संतान सुख की कामना करते हैं। हालांकि ये मान्यताएं स्थानीय आस्था और लोकविश्वास का हिस्सा हैं, लेकिन भक्तों के लिए मां झूमाधुरी के प्रति उनका विश्वास बेहद गहरा और भावनात्मक है।
नंदाष्टमी मेले से पहली रात झूमाधुरी मंदिर में होने वाला देवी जागरण इस पूरे धार्मिक आयोजन का विशेष आकर्षण रहता है। शाम ढलते से पहले ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो जाता है। महिलाएं हाथों में दीपक लेकर मां के दरबार में बैठती हैं। इसके बाद शुरू होता है भजन-कीर्तन का सिलसिला, जो देर रात से होते हुए सुबह तक चलता है।
दीपकों की रोशनी से जगमगाता मंदिर परिसर, भजनों की मधुर धुन और मां के जयकारों से गूंजता वातावरण श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति कराता है। महिलाएं पूरी श्रद्धा के साथ मां के भजन गाती हैं और अपनी मनोकामनाएं मैया के चरणों में अर्पित करती हैं। रातभर चलने वाला यह जागरण धार्मिक अनुष्ठान के साथ ही क्षेत्र की वर्षों पुरानी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा का भी प्रतीक है।
कई श्रद्धालु विशेष मनोकामना लेकर जागरण में शामिल होते हैं। भक्त मां से अपने परिवार की खुशहाली और मनोकामना पूर्ण होने की प्रार्थना करते हैं। यही कारण है कि देवी जागरण के दौरान मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ देखने को मिलती है।झूमाधुरी मंदिर तक पहुंचने का रास्ता पहाड़ी और कठिन चढ़ाई वाला है। नंदाष्टमी के अवसर पर श्रद्धालु कठिन रास्ते की परवाह किए बिना मां के दर्शन के लिए आगे बढ़ते हैं। बुजुर्गों से लेकर युवा और महिलाएं तक श्रद्धा के साथ इस यात्रा में शामिल होते हैं। कई श्रद्धालुओं के लिए यह यात्रा स्वयं मां के प्रति उनकी भक्ति और समर्पण का प्रतीक होती है।
नंदाष्टमी के अवसर पर ग्राम पाटन और रायकोट महर के मंदिरों से देवी रथ यात्राएं भी निकलती हैं। इन रथ यात्राओं में भगवती और कालिका के देव डांगर शामिल होते हैं, जो श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देते हैं। पारंपरिक रीति-रिवाजों और धार्मिक उत्साह के साथ देवी रथ कठिन पहाड़ी मार्ग से होते हुए झूमाधुरी मंदिर की ओर बढ़ते हैं। जैसे-जैसे रथ मंदिर के करीब पहुंचते हैं, श्रद्धालुओं का उत्साह और भक्ति और अधिक बढ़ जाती है।झूमाधुरी धाम में नंदाष्टमी का मेला क्षेत्र की लोकसंस्कृति और सामुदायिक एकता का भी प्रतीक है। मेले के दौरान आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं। वर्षों पुरानी परंपराएं नई पीढ़ी तक पहुंचती हैं और युवा भी इन धार्मिक आयोजनों में उत्साह के साथ भाग लेते हैं।
झूमाधुरी मैया से जुड़ी लोककथाएं और मान्यताएं आज भी बुजुर्गों द्वारा नई पीढ़ी को सुनाई जाती हैं। इन्हीं कथाओं के माध्यम से मां के प्रति लोगों की आस्था पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही है। निस्संतान दंपतियों के लिए मां का दरबार उम्मीद और विश्वास का केंद्र बना हुआ है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां के दरबार में सच्चे मन से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती।
नंदाष्टमी की रात होने वाला देवी जागरण इसी आस्था को और मजबूत करता है। जब मंदिर परिसर में महिलाएं दीपक लेकर मां के भजन गाती हैं और चारों ओर मां के जयकारे गूंजते हैं, तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है। सुबह की पहली किरण के साथ जागरण का समापन होता है और श्रद्धालु मां का आशीर्वाद लेकर अपने घरों को लौटते हैं।
झूमाधुरी मैया का यह धाम आज भी पहाड़ की गहरी धार्मिक आस्था, लोकपरंपरा और विश्वास की जीवंत पहचान है। निस्संतान दंपतियों के लिए यह स्थान विशेष उम्मीद से जुड़ा हुआ है, वहीं क्षेत्र के लोगों के लिए मां झूमाधुरी उनकी आराध्य देवी और आस्था का आधार हैं। वर्षों से चली आ रही परंपराएं, देवी जागरण, दीपों की रोशनी, भजन-कीर्तन और नंदाष्टमी की रथ यात्रा इस धाम की धार्मिक महत्ता को और बढ़ाती है। यही कारण है कि हर वर्ष श्रद्धालु कठिन चढ़ाई पार कर मां के दरबार में पहुंचते हैं और पूरी श्रद्धा के साथ झूमाधुरी मैया के चरणों में शीश झुकाकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।आप सभी पाठक भी 18 सितंबर को देवी जागरण एवं भंडारे और 19 सितम्बर रथयात्रा में सादर आमंत्रित हैं ।

(लेखक ग्राम पाटन पाटनी निवासी हैं)
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