रिपोर्ट: लक्ष्मण बिष्ट : चंपावत:चुनावी शोर में कहीं फिर न दब जाए राज्य आंदोलनकारियों की आवाज़: भूपेंद्र देव (ताऊ)
Laxman Singh Bisht
चुनावी शोर में कहीं फिर न दब जाए राज्य आंदोलनकारियों की आवाज़: भूपेंद्र देव (ताऊ)

उत्तराखंड में चुनावी हलचल तेज हो रही है। राजनीतिक दल जनता के बीच नए वादों और घोषणाओं के साथ पहुंच रहे हैं। लेकिन इस चुनावी शोर के बीच एक ऐसी आवाज़ है, जिसे वर्षों से केवल सुना जा रहा है, समझा नहीं जा रहा यह आवाज़ है उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों की। जिले के प्रमुख राज्य आंदोलनकारी भूपेश देव ताऊ ने कहा उत्तराखंड राज्य का निर्माण किसी सरकार की देन नहीं, बल्कि हजारों आंदोलनकारियों के संघर्ष, बलिदान और शहादत का परिणाम है। जिन लोगों ने राज्य निर्माण के लिए लाठियां खाईं, जेल गए, अपना रोजगार और परिवार तक दांव पर लगा दिया, वे आज अपने ही राज्य में सम्मान और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने को विवश हैं। सेवारत राज्य आंदोलनकारी वर्षों से अपनी न्यायोचित मांगों, विशेषकर आश्रित प्रमाण पत्र की व्यवस्था को लेकर मुख्यमंत्री, मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष गुहार लगा रहे हैं। अनेक बार ज्ञापन दिए गए, बैठकें हुईं और आश्वासन भी मिले, लेकिन समाधान आज तक नहीं निकला।देहरादून स्थित शहीद स्थल पर पिछले 46 दिनों से शांतिपूर्ण आंदोलन जारी है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेता वहां पहुंचकर संवेदना व्यक्त करते हैं, तस्वीरें खिंचवाते हैं और फिर लौट जाते हैं। दुखद यह है कि आंदोलनकारियों की मांगों के समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम दिखाई नहीं देता। एक सच्चाई यह भी है कि राज्य आंदोलनकारियों का विभिन्न संगठनों और गुटों में बंट जाना उनके आंदोलन को कमजोर कर रहा है। यदि सभी आंदोलनकारी एक मंच पर एकजुट होकर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ें, तो सरकार के लिए उनकी आवाज़ को अनसुना करना आसान नहीं होगा। आज सबसे बड़ा प्रश्न सरकार से भी है और समाज से भी। क्या उत्तराखंड राज्य बनाने वालों को सम्मान और न्याय मिलना केवल चुनावी भाषणों का विषय बनकर रह जाएगा? क्या आंदोलनकारियों को हर बार केवल आश्वासन ही मिलेगा?यह केवल एक प्रमाण पत्र का मुद्दा नहीं है। यह उत्तराखंड आंदोलन की गरिमा, शहीदों के सम्मान और लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा है। यदि राज्य निर्माण के नायकों को ही न्याय नहीं मिलेगा, तो यह पूरे प्रदेश के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह चुनावी राजनीति से ऊपर उठकर राज्य आंदोलनकारियों की न्यायोचित मांगों पर तत्काल निर्णय ले। यही उत्तराखंड आंदोलन के शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही राज्य की असली पहचान भी।
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