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रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट : लोहाघाट:बातों-बातों में:झूठे आरोप की कीमत:पांडे

Laxman Singh Bisht

Fri, May 8, 2026

बातों-बातों में:झूठे आरोप की कीमत:पांडे

उत्तराखंड के चम्पावत जिले की एक चर्चित घटना इन दिनों अखबारों और सोशल मीडिया में चर्चा का विषय बनी हुई है। मामला एक नाबालिग लड़की के साथ सामूहिक दुष्कर्म का बताया गया। ऐसी खबरें आजकल आग की तरह फैलती हैं।लेकिन पुलिस की प्रारंभिक स्थलीय जांच, साक्ष्य संकलन और चिकित्सकीय रिपोर्ट के बाद मामला एक अलग दिशा में मुड़ गया। पुलिस के अनुसार अब तक की जांच में यह मामला पूर्णतः कूटरचित और भ्रामक प्रतीत हुआ है। बताया गया कि न तो दुष्कर्म हुआ और न ही मारपीट के प्रमाण मिले। खैर, अंतिम सत्य तक पहुँचना और नियमानुसार आवश्यक वैधानिक कार्रवाई करना जांच एजेंसियों का काम है। इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि ऐसा कोई मामला झूठा, प्रलोभनयुक्त, शरारतपूर्ण या साजिश के तहत गढ़ा गया हो, तो उसकी सबसे बड़ी कीमत कौन चुकाता है? अक्सर इसका उत्तर होता है—वह लड़की, जिसका नाम पूरे समाज में चर्चा का विषय बन चुका होता है।

हमारा समाज आज भी किसी लड़की के व्यक्तित्व से अधिक उसके चरित्र पर टिप्पणी करने में रुचि रखता है। आरोप सही हो या गलत, घटना सत्य हो या असत्य, एक बार यदि किसी लड़की या महिला का नाम दुष्कर्म जैसे मामले से जुड़ जाए, तो उसके मानसिक और सामाजिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। लोग कानाफूसी करते हैं, संदेह भरी नजरों से देखते हैं, रिश्तेदार और परिचित दूरी बनाने लगते हैं। पीड़िता ही नहीं, उसका पूरा परिवार भीतर ही भीतर टूटने लगता है।सबसे दुःखद यह है कि समाज सच्चाई सामने आने के बाद भी अपनी धारणा आसानी से नहीं बदलता। “कुछ तो हुआ होगा” जैसे वाक्य उस पीड़िता का लंबे समय तक पीछा करते रहते हैं। स्कूल, कॉलेज, दफ्तर, पड़ोस और सामाजिक आयोजनों में उसे असहज निगाहों का सामना करना पड़ सकता है। कई बार ऐसी परिस्थितियां अवसाद, भय, आत्मग्लानि और सामाजिक असुरक्षा को जन्म देती हैं। बदनामी का बोझ पीड़िताओं को आत्मघाती कदम उठाने तक मजबूर कर देता है।

यदि कोई व्यक्ति निजी दुश्मनी, राजनीतिक लाभ, निजी व सामाजिक बदले या व्यक्तिगत प्रसिद्धि के लिए किसी लड़की को ऐसे मामले का चेहरा बनाता है, तो यह केवल कानूनी अपराध नहीं, बल्कि एक मासूम जीवन के भविष्य से खिलवाड़ भी है। किसी नाबालिग की पहचान, सम्मान और मानसिक स्थिति को दांव पर लगाकर अपनी लड़ाई लड़ना अत्यंत अमानवीय है।यह भी उतना ही सच है कि वास्तविक दुष्कर्म पीड़िताओं को पहले से ही न्याय पाने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसे विवादित या झूठे मामलों से उनकी आवाज भी कमजोर पड़ती है। आम लोग ही नहीं, कई बार पुलिस और प्रशासन भी हर शिकायत को संदेह की दृष्टि से देखने लगते हैं, जो और अधिक खतरनाक स्थिति पैदा करता है। इसलिए आवश्यकता केवल कानूनी जाँच की नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता की भी है। समाचार माध्यमों, सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं, राजनीतिक दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं सभी को यह समझना होगा कि किसी घटना को सनसनी बनाकर प्रस्तुत करने से पहले उसके दूरगामी परिणाम क्या हो सकते हैं। विशेषकर तब, जब मामला किसी नाबालिग लड़की से जुड़ा हो।हमें याद रखना चाहिए कि किसी भी घटना में सबसे पहले और सबसे अधिक सुरक्षा पीड़िता की गरिमा, पहचान और मानसिक स्थिति की होनी चाहिए। न्याय का अर्थ केवल दोषी को सजा देना नहीं, बल्कि निर्दोष को अनावश्यक सामाजिक दंड से बचाना भी है।भगवत प्रसाद पाण्डेय पाटन पाटनी (लोहाघाट)

(लेखक साहित्यकार और रेवेन्यू एडमिस्ट्रेशन के सेवा निवृत अधिकारी हैं)

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