रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट : 125 वर्षों की गौरवशाली धरोहर है लोहाघाट की ऐतिहासिक रामलीला-शशांक पाण्डेय।।
Laxman Singh Bisht
Sun, Sep 28, 2025
125 वर्षों की गौरवशाली धरोहर है लोहाघाट की रामलीला-शशांक पाण्डेय
लोहाघाट की पहचान केवल उसकी मनमोहक वादियों और ऐतिहासिक मंदिरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ की जीवंत सांस्कृतिक परंपराएँ भी उसे विशेष बनाती हैं। इन्हीं परंपराओं में सबसे गौरवशाली स्थान रखती है लोहाघाट की रामलीला। यह रामलीला धार्मिक आयोजन के साथ साथ पूरे समाज का साझा उत्सव है, जो सवा शताब्दी से भी अधिक समय से निरंतर अपनी छाप छोड़ता आ रहा है। 125 वर्षों की यह सांस्कृतिक यात्रा अपने आप में इतिहास का वह पन्ना है, जिस पर आस्था, परंपरा, कला और समाज की एकता के अक्षर स्वर्णिम रूप से अंकित हैं।
लोहाघाट की रामलीला का आरंभ साधनों की कमी और कठिन परिस्थितियों के बीच हुआ था। उस समय न तो बिजली की जगमगाहट थी, न ही ध्वनि विस्तारक यंत्र, लेकिन श्रद्धा और उत्साह से भरे स्थानीय लोगों ने मिलकर इस आयोजन को प्रारंभ किया। आरंभ में यह छोटे पैमाने पर हुआ करता था, लेकिन धीरे-धीरे इसकी ख्याति पूरे क्षेत्र में फैलने लगी। यह आयोजन इतना लोकप्रिय हुआ कि समय बीतने के साथ यह लोहाघाट की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा बन गया।रामलीला की सबसे बड़ी विशेषता इसकी संवाद शैली है। यहाँ पात्र केवल अभिनय नहीं करते बल्कि अपने संवादों से वातावरण को जीवंत बना देते हैं। राम का कोमल स्वर, लक्ष्मण का उत्साही और तेजस्वी संवाद, सीता की करूणामयी वाणी, रावण का गर्व और हनुमान की निष्ठा—इन सबकी गूंज जब रामलीला मैदान में फैलती है तो दर्शक स्वयं को त्रेतायुग की उस महान गाथा में उपस्थित अनुभव करने लगते हैं। लोग इतने तल्लीन हो जाते हैं कि संवादों के बीच उनकी भावनाएँ उमड़ पड़ती हैं। कभी वे हँसते हैं, कभी आँसुओं से भीग जाते हैं और कभी जयघोष कर पूरा वातावरण गुंजा देते हैं।इस रामलीला की आत्मा इसका संगीत है। हारमोनियम की मधुर धुनें और तबले की गहरी थाप संवादों को एक नई शक्ति प्रदान करती हैं। जब पात्र चौपाइयों और भजनों का गायन करते हैं, तब पूरा मैदान भक्ति रस से सराबोर हो जाता है। आधुनिक यंत्रों और तकनीकी साधनों के युग में भी लोहाघाट की रामलीला अपनी इस पारंपरिक शैली पर अडिग है। यही कारण है कि यहाँ का हर मंचन केवल एक नाट्य रूपांतरण नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव बन जाता है।रामलीला के दिनों में लोहाघाट का पूरा वातावरण ही बदल जाता है। मैदान में जुटी अपार भीड़ किसी मेले से कम नहीं होती। यह भीड़ केवल मनोरंजन की प्यास लेकर नहीं आती बल्कि भक्ति और सामूहिकता की भावना से जुड़कर इस आयोजन को एक जीवंत उत्सव बना देती है। बुज़ुर्ग पुरानी स्मृतियों में खो जाते हैं और नई पीढ़ी संस्कारों और आदर्शों से परिचित होती है।लोहाघाट की रामलीला का महत्व केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक भी है। यह आयोजन पूरे समाज को एक सूत्र में बाँध देता है। कलाकारों से लेकर संगीतज्ञों तक, सजावट करने वालों से लेकर दर्शकों तक—हर कोई इसमें अपनी भूमिका निभाता है। यही कारण है कि यह रामलीला पूरे लोहाघाट की है। यह सामूहिकता ही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है, जिसने इसे 125 वर्षों तक बिना रुके आगे बढ़ाया।रामलीला के माध्यम से समाज को जीवन के अमूल्य संदेश भी मिलते हैं। राम के आदर्श शासन, सीता की पवित्रता, लक्ष्मण की निष्ठा और हनुमान की भक्ति आज भी प्रासंगिक हैं। ये पात्र केवल धार्मिक कथाओं के चरित्र नहीं बल्कि जीवन जीने की दिशा दिखाने वाले आदर्श हैं। रामलीला का प्रत्येक दृश्य दर्शकों को सोचने पर मजबूर करता है कि मर्यादा, त्याग, सेवा और भक्ति जैसे मूल्य ही समाज को सशक्त और जीवन को सार्थक बनाते हैं।आर्थिक दृष्टि से भी रामलीला का बड़ा प्रभाव है। इन दिनों बाज़ारों में रौनक बढ़ जाती है। छोटे दुकानदारों को रोजगार मिलता है, खानपान की दुकानों में भीड़ बढ़ जाती है और पूरे क्षेत्र का वातावरण मेले जैसा हो जाता है। इस प्रकार यह आयोजन केवल सांस्कृतिक ही नहीं बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।समय बदल रहा है, मनोरंजन के साधन बदल रहे हैं और तकनीक ने समाज के स्वरूप को परिवर्तित कर दिया है। फिर भी लोहाघाट की रामलीला अपनी परंपरागत शैली में जीवंत बनी हुई है। इसका सबसे बड़ा कारण है यहाँ की जनता का गहरा विश्वास और निरंतर सहयोग। यह रामलीला आज भी वैसी ही लोकप्रिय है जैसी दशकों पहले थी और यही विश्वास आने वाली पीढ़ियों को इसे और भी समृद्ध रूप में आगे बढ़ाने की प्रेरणा देता है।लोहाघाट की रामलीला धार्मिक आयोजन के साथ एक जीवंत सांस्कृतिक धरोहर है। यह समाज को जोड़ने, संस्कार देने और परंपराओं को जीवित रखने वाला उत्सव है। 125 वर्षों की यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि जब समाज मिलकर किसी परंपरा को संवारता है तो वह अमर हो जाती है। आज यह रामलीला केवल लोहाघाट की शान नहीं बल्कि पूरे उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर है, जो आने वाली पीढ़ियों को सदैव यह संदेश देती रहेगी कि संस्कृति ही जीवन की आत्मा है और परंपराएँ ही भविष्य की दिशा।
(लेखक शशांक पाण्डेय लोहाघाट निवासी एवं शिक्षक है)