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रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट : लोहाघाट डिपो की बूढ़ी गाड़ियों में यात्रियों की सुरक्षा है खतरे में—शशांक पाण्डेय*

Laxman Singh Bisht

Mon, Jan 19, 2026

लोहाघाट डिपो की बूढ़ी गाड़ियों में यात्रियों की सुरक्षा है खतरे में—शशांक पाण्डेय*लोहाघाट डिपो में इन दिनों जो स्थिति बन रही है, वह न केवल चिंताजनक है बल्कि सिस्टम की गंभीर लापरवाही को भी उजागर करती है। यहां ऐसी कई बसें सड़कों पर उतारी जा रही हैं जिनकी तय उम्र पूरी हो चुकी है या जिन्होंने निर्धारित किलोमीटर सीमा पार कर ली है। नियमों के अनुसार इन गाड़ियों को या तो सेवा से हटाया जाना चाहिए था या पूरी तरह ओवरहॉल कर दोबारा फिटनेस के बाद ही चलाया जाना चाहिए था, लेकिन हकीकत यह है कि ये जर्जर बसें आज भी यात्रियों को लेकर पहाड़ी सड़कों पर दौड़ रही हैं।इन बसों की हालत ऐसी है कि कभी कोई वाहन रास्ते में ही खराब हो जाता है, तो कभी किसी न किसी तकनीकी खामी के कारण घंटों यात्रियों को परेशानी झेलनी पड़ती है। इंजन का गर्म हो जाना, गियर और स्टेयरिंग में दिक्कत, अचानक बंद हो जाना—ये अब अपवाद नहीं बल्कि आम बात बन चुकी हैं। सबसे गंभीर स्थिति तब सामने आती है जब सुरक्षा से जुड़ी प्रणालियां ही जवाब दे देती हैं। आज की घटना, जब एक बस के ब्रेक फेल हो गए, इसका ताजा उदाहरण है। यह केवल सौभाग्य था कि कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ, वरना पहाड़ी क्षेत्र में ब्रेक फेल होना सीधे मौत को न्योता देने जैसा है।बीते दिनों लोहाघाट से देहरादून जा रही एक बस में अचानक आग लगने की घटना ने पूरे जिले को हिला कर रख दिया था। चलते वाहन में आग लगना यह साफ संकेत देता है कि गाड़ियों की वायरिंग, इंजन और अन्य तकनीकी हिस्सों की स्थिति कितनी खराब हो चुकी है। वह बस पूरी तरह जल गई। उस दिन भी किस्मत ने साथ दिया और कोई जानलेवा हादसा नहीं हुआ, लेकिन सवाल यह है कि क्या हर बार किस्मत ही यात्रियों की सुरक्षा की गारंटी बनेगी?परिवहन विभाग के नियम बेहद स्पष्ट हैं। किसी भी सरकारी या निजी वाहन की एक तय आयु और किलोमीटर सीमा निर्धारित होती है। उसके बाद वाहन को चलाना न सिर्फ नियमों का उल्लंघन है, बल्कि सीधे तौर पर मानव जीवन को खतरे में डालना है। इसके बावजूद लोहाघाट डिपो में इन नियमों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है। ऐसा प्रतीत होता है मानो कागज़ों में फिटनेस दिखा देना ही पर्याप्त मान लिया गया हो, जबकि ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है।लोहाघाट और आसपास का क्षेत्र पहाड़ी है, जहां सड़कें संकरी हैं, मोड़ तीखे हैं और जरा सी चूक भी बड़े हादसे में बदल सकती है। ऐसे इलाके में यदि बस तकनीकी रूप से कमजोर हो, तो खतरा कई गुना बढ़ जाता है। यहां सवाल केवल बस के खराब होने का नहीं, बल्कि सैकड़ों यात्रियों की जान का है, जो रोज़ाना मजबूरी में इन्हीं बसों से सफर करते हैं। छात्र, बुज़ुर्ग, महिलाएं और कर्मचारी—सभी एक ऐसे सिस्टम के भरोसे हैं जो खुद जर्जर हो चुका है।यह स्थिति प्रशासन और परिवहन निगम दोनों के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यदि समय रहते इन पुरानी बसों को सेवा से नहीं हटाया गया, तो किसी दिन एक बड़ी दुर्घटना होना तय है, जिसकी जिम्मेदारी कोई भी लेने को तैयार नहीं होगा। हादसे के बाद जांच, बयान और मुआवज़े की औपचारिकताएं शुरू होंगी, लेकिन तब तक जो नुकसान हो चुका होगा, उसकी भरपाई संभव नहीं होगी।लोहाघाट डिपो की ये जर्जर बसें सिर्फ लोहे का ढांचा नहीं हैं, बल्कि लापरवाही की चलती-फिरती मिसाल हैं। यात्रियों की सुरक्षा किसी भी व्यवस्था की पहली जिम्मेदारी होती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रशासन देवयोग के भरोसे चलने के बजाय समय रहते ठोस कदम उठाएगा, वरना अगली खबर चेतावनी नहीं, बल्कि एक दर्दनाक त्रासदी की कहानी होगी।

(लेखक लोहाघाट निवासी हैं और समसामहिक मुद्दों पर नियमित लिखते है)

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