रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट : चम्पावत केवल एक ज़िला नहीं, हमारी आत्मा है-शशांक पाण्डेय
Laxman Singh Bisht
Mon, Sep 15, 2025
चम्पावत केवल एक ज़िला नहीं, हमारी आत्मा है-शशांक पाण्डेय
उत्तराखंड की धरती देवभूमि कहलाती है, और इस देवभूमि के हृदय में बसा है चम्पावत जिला। इतिहास, संस्कृति, आध्यात्मिकता और प्राकृतिक सौंदर्य से ओतप्रोत यह जिला 15 सितंबर को अस्तित्व में आया, उसी दिन ने इसके लोगों को एक नई पहचान दी। यही कारण है कि स्थापना दिवस का महत्व केवल प्रशासनिक दृष्टि से नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक दृष्टि से भी अत्यंत विशेष है।
चम्पावत का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। यह वही भूमि है, जहाँ कुमाऊँ के चंद वंश ने अपनी राजधानी स्थापित की थी। चंद राजाओं ने यहां से शासन करते हुए कुमाऊँ की संस्कृति और परंपराओं को नई दिशा दी। चम्पावत न केवल सत्ता का केंद्र था, बल्कि यहां धार्मिक और सामाजिक गतिविधियाँ भी उत्कर्ष पर रहीं। बालेश्वर मंदिर, नागनाथ मंदिर के प्राचीन अवशेष और काली कुमाऊँ की भूमि उस गौरवशाली अतीत की गवाही देते हैं।
स्थापना दिवस इस गौरव को याद करने का अवसर है। यह हमें सिखाता है कि हमारे पूर्वजों ने कितनी दूरदर्शिता और मेहनत से इस क्षेत्र को विकसित किया और हमारी संस्कृति को संजोकर रखा।
चम्पावत का नाम आते ही आस्था से जुड़े अनेक स्थल स्मृति में ताज़ा हो जाते हैं। पूर्णागिरि धाम, बालेश्वर महादेव, ब्यानधुरा, मानेश्वर मंदिर,बराही मंदिर,झूमाधुरी मंदिर,गोलू देवता मंदिर जैसे पावन धामों ने इस जिले को धार्मिक दृष्टि से महान बनाया है। हर साल हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं।
स्थापना दिवस पर यह धार्मिक परंपरा और भी सशक्त रूप से सामने आती है। लोग भजन-कीर्तन, मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना और लोकनृत्य-लोकगीतों के माध्यम से अपनी आस्था को व्यक्त करते हैं। यह दिन हमें यह याद दिलाता है कि हमारी संस्कृति और परंपराएँ हमारी सबसे बड़ी पूँजी हैं।
चम्पावत की वादियाँ, नदियाँ और जंगल इसे प्राकृतिक रूप से अनुपम बनाते हैं। यहाँ के जंगलों में विभिन्न प्रजातियों के वन्य जीव पाए जाते हैं। बाणासुर का किला, लोहाघाट, मायावती आश्रम, अद्भुत दृश्यों से भरा पाटी क्षेत्र और बाराकोट और पूर्णागिरि तहसील जैसे स्थल इसे पर्यटन का केंद्र बनाते हैं।
स्थापना दिवस हमें यह प्रेरणा देता है कि हम इस प्राकृतिक सौंदर्य को केवल देखने तक सीमित न रखें, बल्कि इसका संरक्षण करें और पर्यटन को बढ़ावा देकर इसे विश्व पटल पर नई पहचान दिलाएँ।
जब हम स्थापना दिवस मनाते हैं, तो यह अवसर हमें आत्ममंथन का भी मिलता है। यह दिन हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि जिला बनने के बाद हमने कौन-कौन सी उपलब्धियाँ हासिल कीं और किन क्षेत्रों में अभी मेहनत की आवश्यकता है।
शिक्षा के क्षेत्र में आज चम्पावत निरंतर आगे बढ़ रहा है। विद्यालयों और महाविद्यालयों की संख्या बढ़ी है, बच्चे उच्च शिक्षा की ओर अग्रसर हो रहे हैं। स्वास्थ्य सुविधाएँ भी धीरे-धीरे मजबूत हो रही हैं। सड़क, पुल और परिवहन के क्षेत्र में निरंतर सुधार से चम्पावत की कनेक्टिविटी बेहतर हो रही है।
लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। रोज़गार के अवसर, उद्योग-धंधों की स्थापना, आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार और पर्यटन को व्यवस्थित रूप से विकसित करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। स्थापना दिवस हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि हम इन क्षेत्रों में भी और तेजी से काम करेंगे।
स्थापना दिवस का सबसे बड़ा महत्व यह है कि यह दिन पूरे जिले के लोगों को एक सूत्र में बाँध देता है। चाहे कोई किसान हो, छात्र हो, व्यापारी हो या कोई अन्य – हर कोई इस दिन गर्व महसूस करता है कि वह चम्पावत की मिट्टी से जुड़ा है।
गाँव-गाँव और कस्बों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है।
यह दिन हमें याद दिलाता है कि चम्पावत केवल भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि एक परिवार है।
स्थापना दिवस का अर्थ तभी सार्थक होगा जब हम इसे केवल उत्सव तक सीमित न रखें, बल्कि इससे प्रेरणा लेकर अपने जिले को आगे ले जाएँ। हमें यह ठानना होगा कि चम्पावत को शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन और सांस्कृतिक संरक्षण का आदर्श जिला बनाएँगे।
प्राकृतिक संसाधनों का सही उपयोग, युवाओं को रोजगार के अवसर, कृषि और बागवानी को बढ़ावा, साथ ही स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता – यही वे बिंदु हैं जिन पर हमें आगे बढ़ना है।
अतः चम्पावत ज़िले का स्थापना दिवस केवल एक ऐतिहासिक घटना का स्मरण नहीं है, बल्कि यह हमारी अस्मिता, हमारी परंपराओं और हमारे सामूहिक भविष्य की नई आशाओं का प्रतीक है। यह दिन हमें गर्व से भर देता है और यह प्रेरणा भी देता है कि हम अपने जिले को हर क्षेत्र में अग्रणी बनाएँ।
यह दिवस हमें यह संदेश देता है कि अगर हम सब मिलकर प्रयास करें, तो चम्पावत केवल उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि पूरे भारत की शान बन सकता है। इस दिन हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर को सहेजेंगे, अपने प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करेंगे और अपने जिले को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने के लिए निरंतर प्रयासरत रहेंगे।
(लेखक लोहाघाट निवासी शिक्षक हैं)