रिपोर्ट: लक्ष्मण बिष्ट : चंपावत:आत्महत्या के बढ़ते मामलो को नहीं किया जा सकता नज़रअंदाज:शशांक पाण्डेय
Laxman Singh Bisht
Thu, Feb 5, 2026
आत्महत्या के बढ़ते मामलो को नहीं किया जा सकता नज़रअंदाज:शशांक पाण्डेय
आज आत्महत्या के बढ़ते मामले केवल किसी व्यक्ति की निजी पीड़ा नहीं रह गए हैं, बल्कि यह हमारे समाज के भीतर गहराते मानसिक, सामाजिक और आर्थिक संकट का संकेत बन चुके हैं। कामकाजी लोग, छात्र और बेरोज़गार युवा—कोई भी वर्ग इससे अछूता नहीं दिखता। यह स्थिति हमें सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं और कहाँ चूक हो रही है। आधुनिक जीवन की तेज़ रफ्तार ने सुविधाएँ तो बढ़ाई हैं, लेकिन मन की शांति कहीं पीछे छूटती जा रही है। लगातार तुलना, सफलता का दबाव, असफलता का भय और भविष्य को लेकर अनिश्चितता—ये सब मिलकर व्यक्ति को भीतर से तोड़ने लगते हैं। कई लोग अपने दर्द को शब्द नहीं दे पाते, क्योंकि उन्हें डर होता है कि कहीं उन्हें कमज़ोर न समझ लिया जाए। यही चुप्पी धीरे-धीरे घातक रूप ले लेती है।छात्रों की बात करें तो आज पढ़ाई केवल ज्ञान का माध्यम नहीं रह गई है, बल्कि अंकों, रैंक और करियर की दौड़ बन चुकी है। माता-पिता और समाज की अपेक्षाएँ कई बार बच्चों की उम्र और क्षमता से कहीं अधिक होती हैं। एक परीक्षा, एक परिणाम या एक असफलता को जीवन का अंतिम पड़ाव मान लिया जाता है, जबकि वास्तव में जीवन अवसरों से भरा होता है। दुर्भाग्यवश यह बात उस समय समझ में नहीं आ पाती जब मन सबसे अधिक दबाव में होता है।कामकाजी वर्ग भी कम तनाव में नहीं है। नौकरी की अस्थिरता, बढ़ती महँगाई, कार्यस्थल का दबाव, समय की कमी और पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ—इन सबके बीच व्यक्ति खुद के लिए जगह ही नहीं निकाल पाता। भावनात्मक थकान को नज़रअंदाज़ किया जाता है और धीरे-धीरे मानसिक स्वास्थ्य कमजोर होने लगता है। बेरोज़गार युवाओं के लिए स्थिति और कठिन हो जाती है, जहाँ निराशा, आत्मसम्मान को ठेस और समाज की टिप्पणियाँ उन्हें अंदर से तोड़ देती हैं।इस समस्या की जड़ में केवल व्यक्तिगत कारण नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक सोच भी है। हम सफलता का जश्न तो मनाते हैं, लेकिन संघर्ष और असफलता पर चुप्पी साध लेते हैं। हम मजबूत दिखने की सलाह देते हैं, लेकिन भावनाएँ साझा करने का सुरक्षित माहौल नहीं बनाते। परिणामस्वरूप व्यक्ति अकेला महसूस करता है, जबकि उसे सबसे ज़्यादा साथ की ज़रूरत होती है।
समाधान के लिए सबसे पहले मानसिक स्वास्थ्य को उतनी ही गंभीरता से लेना होगा जितनी शारीरिक स्वास्थ्य को दी जाती है। परिवारों में संवाद बढ़े, स्कूलों और कॉलेजों में परामर्श की व्यवस्था सशक्त हो, और कार्यस्थलों पर मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाए। यह समझ विकसित करनी होगी कि मदद माँगना कमजोरी नहीं, बल्कि साहस है।
सरकार और समाज दोनों की भूमिका अहम है—जागरूकता अभियान, परामर्श सेवाएँ, और सहायक नीतियाँ इस दिशा में प्रभावी कदम हो सकते हैं। लेकिन सबसे बड़ी जिम्मेदारी हम सबकी है। किसी की बात ध्यान से सुनना, बिना जज किए उसका साथ देना और उसे यह एहसास दिलाना कि वह अकेला नहीं है—कभी-कभी यही छोटे कदम किसी बड़े संकट को टाल सकते हैं।
जीवन में अंधेरे पल आते हैं, लेकिन वे स्थायी नहीं होते। उम्मीद, सहानुभूति और सहयोग के सहारे हम न केवल इस गंभीर समस्या को समझ सकते हैं, बल्कि कई अनमोल जिंदगियों को समय रहते बचा भी सकते हैं।
(लेखक लोहाघाट निवासी एवं शिक्षक हैं)