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रिपोर्ट: लक्ष्मण बिष्ट : चंपावत:बातों-बातों में हरेले के सरकारी पेड़: पौध रोपण नहीं फोटो रोपण :भगवत प्रसाद पांडे

Laxman Singh Bisht

Wed, Jul 15, 2026

बातों-बातों में हरेले के सरकारी पेड़: पौध रोपण नहीं फोटो रोपण :भगवत प्रसाद पांडे

हरेला फिर आ गया। प्रकृति से जुड़ा पहाड़ का सबसे हरा-भरा लोकपर्व। हमारे पुरखे भी इस दिन पेड़ लगाते थे, धरती की हरियाली बढ़ाने के लिये। उन्हें पता था कि पेड़ की महत्ता। वे जानते थे पेड़ लगाना आसान है, पेड़ बनाना कठिन।आज भी गाँवों में लोग हरेले पर पेड़ लगाते हैं और साल भर उसकी देखभाल करते हैं। तभी तो वहाँ हरियाली बची हुई है। लेकिन सवाल यह है कि सरकारी भवनों के इर्द-गिर्द और सरकारी ज़मीनों के आसपास अक्सर बंजरपन ही क्यों दिखाई देता है?उत्तराखंड बनने के बाद हरेला सरकारी वृक्षारोपण का एक बड़ा पर्व भी बन गया। हर साल बड़े-बड़े पौधारोपण अभियान चलते हैं। लेकिन इस दिन पौधारोपण कम, पौधारोपण के कार्यक्रम ज़्यादा होते हैं। उद्यान और वन विभाग के पौधों से पहले वहाँ कैमरे पहुँचते हैं। गड्ढों के बनने से पहले बैनर गड़ते हैं। फावड़ों और कुदालों से ज़्यादा प्रेस नोट चलते हैं।जनप्रतिनिधि, अधिकारी और कर्मचारी पूरे उत्साह से पौधे लगाते हैं। कैमरे मुस्कुराते हैं, अख़बार और सोशल मीडिया अगले दिन हरियाली से भर जाते हैं। उधर ज़मीन पर रोपे पौधे मुरझाने लगते हैं। न पानी, न रखवाला, न किसी की चिंता। शायद इसलिए सरकारी पौधों की उम्र अक्सर फोटो छपने तक ही होती है।राज्य बने पच्चीस वर्ष हो गए। हर साल लाखों पौधे लगाए जाने के दावे होते हैं। अगर उन दावों का आधा हिस्सा भी सचमुच पेड़ बन गया होता, तो आज उत्तराखंड में जंगलों को जंगल ढूँढ़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती।अगले हरेले तक पिछले साल के पौधे गायब हो चुके होते हैं। लेकिन चिंता की कोई बात नहीं। उनकी जगह नए पौधे, नए गड्ढे, नए चेहरे और वही पुराने भाषण तैयार रहते हैं। लगता है, पौधारोपण नहीं, 'फोटोरोपण अभियान' चल रहा है।यह सब सरकारी नौटंकियां कब तक चलती रहेंगी, मालूम नहीं। हाँ, अब समय आ गया है कि पौधे लगाने वालों की नहीं, पौधे बचाने वालों की तस्वीरें छपें। क्योंकि पेड़ कैमरे की फ्लैश से नहीं, पानी, देखभाल और जिम्मेदारी से बड़े होते हैं।

■भगवत प्रसाद पाण्डेय

पाटन-पाटनी (लोहाघाट)

(लेखक साहित्यकार और जिला राजस्व विभाग के से.नि.अधिकारी हैं)

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