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: लोहाघाट:समय रहते यदि जंगलों को दावाग्नि से नहीं बचाया गया तो मानव तरस जाएगा एक-एक बूंद पानी के लिए:गजेंद्र पाठक /वन पंचायत सरपंचों ने अपने पंचायती जंगलों को बचाने के लिए लिया सामूहिक संकल्प। 

Laxman Singh Bisht

Sat, Feb 15, 2025
समय रहते यदि जंगलों को दावाग्नि से नहीं बचाया गया तो मानव तरस जाएगा एक-एक बूंद पानी के लिए लोहाघाट वन विभाग एवं जिला प्रशासन के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित कार्यशाला में बताया गया कि यदि हमने वनों को आग से बचाने का स्वयं प्रयास नहीं किया तो वह दिन दूर नहीं जब हमारी आने वाली पीढ़ी एक-एक बूंद पानी के लिए तरस जाएगी। कार्यशाला में शीतलाखेत मॉडल की उपयोगिता पर विस्तार से चर्चा करते हुए गजेंद्र पाठक ने बताया कि किस प्रकार हिमालयी क्षेत्र में जंगल सिकुड़ने का कारण पर्यावरणीय परिस्थितियां पैदा होती जा रही हैं, उनका कहना था कि अनादि काल से वनों का मनुष्य से रिश्ता रहा है, जब तक हम एक दूसरे के पूरक बने रहे तब तक सब ठीक-ठाक चल रहा था लेकिन आज परिस्थितियां एकदम बदल चुकी हैं पिछले 45 वर्ष के दौरान पर्यावरण परिस्थितियों में आए बदलाव का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जहां जल स्रोत आधे रह गए हैं वहीं मौसम चक्र में बदलाव के कारण असमय ही बुरांश के फूल खिलने लगे हैं। लोहाघाट क्षेत्र में जहां पहले डिलीशियस सेब से बाग लदे रहते थे आज उसका नामोनिशान तक मिट चुका है उन्होंने चेतावनी की यदि समय रहते वनाग्नि एवं वन संरक्षण के प्रति हमारा दृष्टिकोण नहीं बदला तो हम भावी पीढ़ी के लिए हरे भरे जंगलों के स्थान पर रेगिस्तान छोड़ जाएंगे।इससे पूर्व कार्यशाला का शुभारंभ करते हुए ऊप प्रभागीय वनाधिकारी नेहा चौधरी ने कहा वन हमारे पूर्वजों की ऐसी धरोहर है कि जो पीढ़ी दर पीढ़ी हमको शुद्ध हवा एवं पानी देते आ रहे हैं , वनों में मनुष्य का हस्तक्षेप लगातार बढ़ने के कारण आज ऐसी परिस्थितियों पैदा हो गई हैं, जिसका हमारे स्वास्थ्य संस्कृति प्रकृति एवं परंपराओं पर इसका असर पड़ा है। दिनों दिन बढ़ती जा रही बनाग्नि की घटनाओं को रोकने के लिए शनिवार को डीएफओ चंपावत नवीन पंत के निर्देश वह एसडीओ नेहा सोन के नेतृत्व में लोहाघाट ब्लॉक सभागार में बाराकोट व लोहाघाट क्षेत्र के वन सरपंचों की बनाग्नि सुरक्षा प्रशिक्षण एवं जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें 165 बन सरपंचों सहित पर्यावरण प्रेमियों व बन कर्मियों व पर्यावरण प्रेमियों ने प्रतिभाग किया गोष्ठी में एसडीओ चंपावत नेहा सोन व वनमित्र शीतलाखेत रानीखेत से आए गजेंद्र पाठक के द्वारा सभी बन सरपंचों को जागरुक करते हुए कहा आज जलवायु परिवर्तन, पेयजल स्रोतों व नदियों का सूखना वनों का अंधाधुंध कटान व बनाग्नि है सरकार के द्वारा बनाग्नि को आपदा घोषित किया गया है उन्होंने कहा आज हमें अपने जंगलों को बचाना होगा जिसमें सबसे बड़ी भूमिका ग्रामीणों की है उन्होंने कहा जंगलों में आग लगने से कई दुर्लभ जंगली जीव जंतु विलुप्त की कगार पर पहुंच चुके हैं पेयजल स्रोत गायब हो गए हैं हिमालय पर धीरे-धीरे बर्फ कम होते जा रही है ग्लेशियर पिघलने लगे हैं उन्होंने कहा पर्यावरण को बचाने के लिए हमें अधिक से अधिक पौधे लगाने होंगे तथा उनकी देखभाल करनी होगी घास के लिए ग्रामीणों को जंगलों में आग नहीं लगानी होगी तथा खरपतवार को देखरेख में जलाना होगा तथा गांव से पलायन रोकना पड़ेगा सरकार को भी इस विषय पर गंभीर होना पड़ेगा उन्होंने कहा जंगल है तभी जीवन है हम अपने जंगलों को बचाकर आने वाली पीढियां को एक स्वच्छ पर्यावरण दे सकते हैं अगर जंगल नहीं बचाए गए तो वह दिन दूर नहीं जब उसके घातक परिणाम मानव जाति को भुगतने पड़ेंगे जंगल की आग ही मानव वन्य जीव संघर्ष का प्रमुख कारण इस दौरान सभी लोगों ने जंगलों को बचाने का संकल्प लिया एसडीओ नेहा सोने कहा जंगलों को बचाने में महिलाओं को बड़ी भूमिका निभानी पड़ेगी तभी प्रकृति बच पाएगी उन्होंने शीतलाखेत मॉडल को अपनाने की अपील की जहां वनमित्र गजेंद्र पाठक के नेतृत्व में महिलाओं ने अपने जंगल बचाए हैं उन्होंने कहा वनों को आय से जोड़ने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध है, यदि उनका दोहन किया जाए तो प्रति व्यक्ति आय में इजाफा किया जा सकता है। इस अवसर पर वनक्षेत्राधिकारी दीप चंद्र जोशी ने ब्लाक अंतर्गत किए जा रहे कार्य पर जहां प्रकाश डाला, वहीं काली कुमाऊं रेंज के वन क्षेत्राधिकारी राजेश जोशी ने बताया कि किस प्रकार हम चूयूरा प्रजाति के पौधों का रोपण कर उस से मौन पालन एवं उसके कई उत्पादों को अपने रोजगार से जोड़ सकते हैं, इस दौरान आपदा विभाग की ओर से सभी सरपंचों को आपदा उपकरण वितरित किए गए कार्यशाला पर सरपंच शंकर राम, मोहन चंद्र पांडे, बृजेश जोशी, सुरेश जोशी,निशांत पुनेठा, डॉ राजेंद्र पुनेठा, गणेश पुनेठा, जगदीश जोशी ने भी चर्चा में भाग लिया इस अवसर पर बाराकोट एवं लोहाघाट ब्लॉकों के सरपंचों के अलावा एसडीआरएफ एवं वनकर्मी मौजूद थे।

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