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लोहाघाट:देवभूमि में डर का राज : अब निदेशालय भी सुरक्षित नहीं”: भूपेश देव (ताऊ)

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देहरादून :शिक्षा निदेशक से मारपीट मामले में भाजपा का कड़ा रुख।आरोपी विधायक से पार्टी करेगी सीधा जवाब तलब।

रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट : लोहाघाट:देवभूमि में डर का राज : अब निदेशालय भी सुरक्षित नहीं”: भूपेश देव (ताऊ)

Laxman Singh Bisht

Sat, Feb 21, 2026

“देवभूमि में डर का राज : अब निदेशालय भी सुरक्षित नहीं”: भूपेश देव (ताऊ)

आज शनिवार को माध्यमिक शिक्षा परिषद निदेशक नौडियाल के साथ उनके कार्यालय में हुई मारपीट पर लोहाघाट के राज्य आंदोलनकारी व शिक्षा विभाग कार्मिक भूपेश देव ताऊ ने गहरी नाराजगी जताते हुए कहा देवभूमि कहलाने वाला उत्तराखंड आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ शिक्षा निदेशालय तक असुरक्षित हो चुका है। जिस प्रदेश की पहचान संयम,संस्कार और संघर्ष से थी, वहाँ अब दबंगई, धमकी और दमन की भाषा बोली जा रही है।प्रश्न सीधा है यदि शिक्षा निदेशक के कक्ष में घुसकर हाथ उठाया जा सकता है, कार्मिकों को जान से मारने की धमकियाँ दी जा सकती हैं, और यह सब सत्ता के प्रतिनिधियों (विधायक )की मौजूदगी में हो सकता है तो आम कर्मचारी और आम नागरिक किसके भरोसे जिए? भूपेश देव ने कहा सरकार का दावा “सुशासन।”का है।लेकिन दृश्य क्या है? निदेशालय में विधायक कार्यकर्ताओं के साथ जातें हैं और निदेशक महोदय से मार पीटकर वापस आ जाते हैं।न्याय के इंतज़ार में थका हुआ कर्मचारी वर्ग असहाय महसूस कर रहा है। कहा जब व्यवस्था सुनती नहीं,तो आक्रोश पनपता है।लेकिन आक्रोश का समाधान क्या हिंसा है?क्या लोकतंत्र अब मुक्कों से चलेगा? ताऊ ने कहा सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि जिस विधायक को विधायिका का प्रतिनिधि कहा जाता है, जिसकी शपथ संविधान की मर्यादा की रक्षा की है उसी के सामने यदि कानून की धज्जियाँ उड़ें, तो यह केवल शर्मनाक नहीं,बल्कि लोकतंत्र की पराजय है।कार्मिकों के 94 दिनों के संघर्ष,आंदोलन और बलिदान के बाद यह राज्य बना था।क्या आंदोलनकारियों ने इसलिए लाठियाँ खाईं थीं कि एक दिन निदेशक को ही सुरक्षा की गुहार लगानी पड़े?आज आवश्यकता केवल निंदा की नहीं है आवश्यकता है निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की।आवश्यकता है दोषियों पर ऐसी कार्रवाई की, जो संदेश दे कि कानून सत्ता से बड़ा है,आवश्यकता है प्रत्येक कार्यालय में प्रकरणों के निस्तारण की स्पष्ट समय-सीमा तय करने की,क्योंकि कहीं न कहीं यह भी सत्य है कि लंबित प्रकरण ही संघर्ष की जड़ बनते जा रहे हैं।फाइलों का ठहराव ही विस्फोट की भूमिका लिखता है।परन्तु यदि इस घटना को भी राजनीतिक रंग देकर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, तो यह केवल एक निदेशक महोदय एवं कार्मिकों की हार नहीं होगी यह शासन व्यवस्था की नैतिक पराजय होगी। ताऊ ने कहा कार्मिकों का सरकार से सीधा प्रश्न है क्या कानून सबके लिए समान है?या सत्ता की छाया में अपराध का कद छोटा हो जाता है?यदि आज कठोर उदाहरण स्थापित नहीं किया गया तो कल हर कार्यालय भय का कक्ष बन जाएगा।और तब “सुशासन” केवल विज्ञापन की पंक्ति रह जाएगा,वास्तविकता नहीं।इतिहास गवाह है ।जब व्यवस्था अहंकार में बहरी हो जाती है,तो जन विश्वास टूट जाता है,और जन विश्वास का टूटना,किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ा संकट होता है।न्याय होना चाहिए। ताऊ ने कहा वह इस घटना की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं। वही इस घटना से शिक्षा विभाग के कार्मिकों में भारीआक्रोश है।

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