रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट : लोहाघाट रंग महोत्सव ने खड़ी होली को नई गरिमा और नई दिशा दी है-शशांक पाण्डेय
Laxman Singh Bisht
Sat, Feb 21, 2026
लोहाघाट रंग महोत्सव ने खड़ी होली को नई गरिमा और नई दिशा दी है-शशांक पाण्डेय
उत्तराखण्ड की समृद्ध सांस्कृतिक परम्पराओं में कुमाऊँ की खड़ी होली का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। रंगों के उत्सव के साथ साथ भक्ति, संगीत, अनुशासन और सामाजिक समरसता का अद्भुत संगम है। ढोल की थाप,झांझर की मधुर तान और सामूहिक स्वरों में गूंजते आवाज़ ये सब मिलकर एक ऐसा वातावरण रचते हैं, जो मन को आध्यात्मिक आनंद से भर देता है।लोहाघाट में 2013 से आयोजित हो रहा रंग महोत्सव ने इसी खड़ी होली को एक नई पहचान, नया मंच और नई प्रतिष्ठा प्रदान की है। पहले जहाँ अलग-अलग गाँवों में होली गाई जाती थी, वहीं अब इस महोत्सव के माध्यम से विभिन्न गाँवों की होली टीमें एक ही मंच पर अपनी प्रस्तुति देती हैं। इससे न केवल विविधता का सुंदर दर्शन होता है, बल्कि लोगों को एक ही स्थान पर अनेक गाँवों की पारम्परिक होली सुनने और देखने का अवसर मिल जाता है। यह सांस्कृतिक एकता का अनुपम उदाहरण है।इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह विभिन्न क्षेत्रों को एक सूत्र में पिरो देता है। दूर-दराज़ के गाँवों से आई टीमें अपने पारम्परिक परिधानों और विशिष्ट गायन शैली के साथ मंच पर आती हैं। हर गाँव की अपनी अलग लय, अलग प्रस्तुति और अलग उत्साह होता है, जिसे दर्शक एक ही दिन में अनुभव कर लेते हैं। यह अपने आप में अद्वितीय है।
ऐसा प्रतीत होता है मानो सम्पूर्ण क्षेत्र की सांस्कृतिक आत्मा लोहाघाट में साकार हो उठी हो। यह आयोजन मनोरंजन के साथ साथ परम्परा के संरक्षण और संवर्धन का एक सशक्त माध्यम बन चुका है।आज के समय में जब कई स्थानों पर होली के अवसर पर अनुशासनहीनता और नशे की प्रवृत्ति देखने को मिलती है, वहीं लोहाघाट का रंग महोत्सव एक सकारात्मक और प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह आयोजन पूर्णतः नशा-मुक्त वातावरण में संपन्न होता है।यहाँ परिवार के साथ महिलाएँ, बुजुर्ग और बच्चे बिना किसी संकोच के कार्यक्रम का आनंद लेते हैं। यह सचमुच एकमात्र ऐसा होली आयोजन प्रतीत होता है जहाँ शराब के नशे में कोई व्यक्ति देखने को नहीं मिलता। यह संदेश देता है कि उत्सव का वास्तविक आनंद संयम, मर्यादा और संस्कृति के साथ ही संभव है।इस महोत्सव में महिलाओं की उपस्थिति और भागीदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। महिला होली दल जब पारम्परिक वेशभूषा में मंच पर आते हैं और मधुर स्वरों में खड़ी होली गाते हैं, तो वातावरण और भी पावन हो उठता है। इससे समाज में यह सशक्त संदेश जाता है कि हमारी सांस्कृतिक परम्पराएँ सबकी साझी धरोहर हैं और महिलाओं की भागीदारी से ही वे और अधिक सशक्त बनती हैं।इस पूरे सांस्कृतिक अभियान के पीछे जिस व्यक्तित्व का विशेष योगदान रहा है, वे हैं रामलीला कमेटी के अध्यक्ष जीवन मेहता। उनके दूरदर्शी नेतृत्व और अथक परिश्रम ने इस महोत्सव को निरंतर नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है।जीवन मेहता ने न केवल आयोजन को व्यवस्थित और भव्य बनाया, बल्कि उसमें अनुशासन और सामाजिक संदेश को भी प्राथमिकता दी। उनका उद्देश्य केवल एक कार्यक्रम आयोजित करना नहीं, बल्कि खड़ी होली की परम्परा को नई पीढ़ी तक पहुँचाना और उसे सम्मान दिलाना है।उनकी सोच स्पष्ट है—संस्कृति का संरक्षण तभी संभव है जब समाज स्वयं आगे आकर उसे अपनाए। उनके प्रयासों से आज लोहाघाट का रंग महोत्सव एक पहचान बन चुका है, जिसे देखने और उसमें भाग लेने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।यह महोत्सव युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने का भी कार्य कर रहा है।
आधुनिकता की दौड़ में जहाँ युवा पारम्परिक लोक-संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं, वहीं यह आयोजन उन्हें अपनी विरासत से परिचित कराता है। मंच पर युवाओं की भागीदारी यह संकेत देती है कि हमारी संस्कृति सुरक्षित हाथों में है।आज लोहाघाट का रंग महोत्सव एक स्थानीय कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि यह कुमाऊँ की सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक बन गया है। यह आयोजन सामाजिक समरसता, नशामुक्ति और परम्पराओं के संरक्षण का संदेश एक साथ देता है।निस्संदेह, यह एक ऐतिहासिक और सराहनीय कार्य है। यदि इसी प्रकार समर्पण, अनुशासन और सांस्कृतिक भावना के साथ यह परम्परा आगे बढ़ती रही, तो आने वाले समय में लोहाघाट की खड़ी होली पूरे प्रदेश में एक आदर्श के रूप में स्थापित होगी।अंततः कहा जा सकता है कि यह रंग महोत्सव रंगों का के साथ साथ संस्कृति, संयम और सामूहिक चेतना का महापर्व है और इसके लिए आयोजक समिति हार्दिक बधाई और अभिनंदन की पात्र हैं।
(लेखक पाटन लोहाघाट निवासी शिक्षक हैं और समसामयिक मुद्दों पर नियमित लिखते हैं)