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रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट : चंपावत:वेद–पुराणों में कुंभ और अर्द्धकुंभ की स्पष्ट परिभाषा दर्ज”—कांग्रेस प्रदेश सचिव आनंद सिंह मेहरा

Laxman Singh Bisht

Sat, Nov 29, 2025

“वेद–पुराणों में कुंभ और अर्द्धकुंभ की स्पष्ट परिभाषा दर्ज”—कांग्रेस प्रदेश सचिव आनंद सिंह मेहरा

अर्ध कुंभ पर घमासान तेजउत्तराखंड सरकार द्वारा हरिद्वार के आगामी अर्द्धकुंभ को “कुंभ” घोषित करने की कोशिश पर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। संत समाज में पहले से ही चला विवाद अब सरकार के इस निर्णय से और गहरा हो गया है।कांग्रेस प्रदेश सचिव आनंद सिंह मेहरा ने इस कदम को परंपराओं से खिलवाड़, धार्मिक मान्यताओं का अपमान और श्रद्धालुओं की आस्था पर सीधा प्रहार बताया है।

आनंद मेहरा ने कहा कि वेद–पुराणों में कुंभ और अर्द्धकुंभ की परिभाषाएँ बिल्कुल स्पष्ट हैं।

शास्त्रों के अनुसार कुंभ पर्व सूर्य, चंद्र और बृहस्पति के दुर्लभ खगोलीय योग पर आधारित दिव्य आयोजन है, जो हर 12 वर्ष में ही संभव होता है।वहीं अर्द्धकुंभ का अपना अलग महत्व, परंपरा और धार्मिक पहचान है।

उन्होंने कहा कि भारत की किसी भी परंपरा में अर्द्धकुंभ को कुंभ घोषित करने का शास्त्रीय आधार नहीं मिलता, इसलिए सरकार का यह फैसला धार्मिक मर्यादा और सनातन परंपराओं—दोनों का खुला उल्लंघन है।

“सरकार किस जल्दबाज़ी में है, और क्या छिपाना चाहती है?” — मेहरा

कांग्रेस प्रदेश सचिव ने गंभीर सवाल उठाए—

“सरकार आखिर इतनी उतावली क्यों है? क्या सचमुच यह सिर्फ आयोजन का नाम बदलने का मामला है, या इसके पीछे वह कुछ छिपाना चाहती है?”

मेहरा ने कहा कि भाजपा शासन में हुए कुंभ घोटाले से पहले ही उत्तराखंड की प्रतिष्ठा को गहरा धक्का लग चुका है। अब अर्द्धकुंभ को “कुंभ” घोषित करने की जिद सरकार की असफलताओं पर पर्दा डालने की हड़बड़ी दिखाई देती है।

उन्होंने कहा—

“नाम बदलने से परंपरा नहीं बदलती, और प्रचार से पवित्रता नहीं बचती।”

संत समाज भी नाराज़—“धार्मिक आयोजन सरकारी प्रचार का माध्यम नहीं”

मेहरा ने दावा किया कि संत समाज के कई प्रतिनिधि भी इस निर्णय से नाखुश हैं। उनका स्पष्ट मत है कि अर्द्धकुंभ का अपना गौरव है और उसे उसी नाम से जाना जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि धर्म को सत्ता की राजनीति का उपकरण बनाना न संत समाज स्वीकार करेगा, न श्रद्धालु सहन करेंगे।

आनंद मेहरा ने कहा—“धर्म आस्था और संस्कार का आधार है; इसे राजनीतिक लालच में तोड़ा-मरोड़ा नहीं जा सकता। सरकार चाहे जितना भी नाम-करण करे, सत्य और शास्त्र दोनों अपनी जगह अडिग हैं।”

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