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चम्पावत के 17 शिक्षक नई दिल्ली में होंगे सम्मानित

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रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट : चम्पावत के 17 शिक्षक नई दिल्ली में होंगे सम्मानित

Laxman Singh Bisht

Fri, Sep 4, 2026

चम्पावत के 17 शिक्षक नई दिल्ली में होंगे सम्मानित

कुमाउनी-गढ़वाली मातृभाषा शिक्षण एवं लोकभाषा संरक्षण के क्षेत्र में योगदान के लिए मिलेगा सम्मान

उत्तराखण्ड की लोकभाषाओं कुमाउनी, गढ़वाली एवं जौनसारी के संरक्षण, संवर्धन तथा नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा से जोड़ने के उद्देश्य से चलाए जा रहे अभियान के तहत जनपद चम्पावत के लिए गौरव का अवसर सामने आया है। 6 सितंबर 2026, रविवार को नई दिल्ली में आयोजित होने वाले सम्मान समारोह में चम्पावत जनपद के 17 शिक्षक एवं भाषा सहयोगी प्रतिभाग करेंगे।उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली एवं डीपीएमआई के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित यह सम्मान समारोह एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर, संसद मार्ग, जंतर-मंतर के निकट, कनॉट प्लेस, नई दिल्ली में दोपहर 3 बजे से आयोजित किया जाएगा। समारोह का मूल संदेश “हमरि भाष–हमरि पच्यान” रखा गया है।

2012 से जारी है मातृभाषा शिक्षण का अभियान

उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली एवं डीपीएमआई द्वारा वर्ष 2012 से ग्रीष्मकालीन उत्तराखण्डी भाषा शिक्षण कक्षाओं का आयोजन किया जा रहा है। इन कक्षाओं के माध्यम से बच्चों और युवाओं को कुमाउनी, गढ़वाली एवं जौनसारी जैसी उत्तराखण्ड की लोकभाषाओं से जोड़ने तथा उन्हें अपनी भाषा, लोकसाहित्य और सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया जा रहा है।इसी क्रम में जनपद चम्पावत में सात केन्द्रों पर मातृभाषा शिक्षण का कार्य संचालित किया जा रहा है। इन केन्द्रों के संचालन और समन्वय में भूपेन्द्र सिंह देव ‘ताऊजी’ का महत्वपूर्ण नेतृत्व रहा है, जबकि अल्मोड़ा के कृपाल सिंह शीला के दिशा-निर्देशन में इस अभियान को निरंतर आगे बढ़ाया जा रहा है।

चम्पावत के 17 शिक्षक करेंगे प्रतिनिधित्व

नई दिल्ली में आयोजित सम्मान समारोह में चम्पावत जनपद के विभिन्न केन्द्रों से जुड़े निम्न 17 शिक्षक एवं सहयोगी प्रतिभाग करेंगे जिनमे श्रीमती पुष्पा पाटनी श्रीमती सीमा जोशी ,श्रीमती तुलसी भट्ट ,श्रीमती हेमा ,श्रीमती ममता ,श्रीमती तुलसी बिष्ट , ललित मोहन तिवारी ,रितेश वर्मा ,जनार्दन गड़कोटी गौरव बंसल , नितिन देऊ भूपेन्द्र सिंह देव ‘ताऊजी’जीवन तिवारी, जगदीश सिंह , जनार्दन चिलकोटी , कृपाल सिंह शीला , सतीश जोशी इन सभी शिक्षकों एवं सहयोगियों ने मातृभाषा शिक्षण के माध्यम से बच्चों को अपनी लोकभाषा से जोड़ने तथा उत्तराखण्ड की समृद्ध लोक परंपरा और संस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में अपना योगदान दिया है।

भाषा के साथ संस्कृति से जोड़ने का प्रयास

मातृभाषा शिक्षण का यह अभियान केवल भाषा पढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसके माध्यम से बच्चों को लोकगीत, लोककथाएं, लोकसाहित्य, पारंपरिक रीति-रिवाज, लोकपर्व, स्थानीय शब्दावली और उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक परंपराओं से भी परिचित कराया जाता है।आज जब तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश, पलायन, आधुनिक जीवनशैली और नई संचार तकनीकों के कारण स्थानीय बोलियों के दैनिक प्रयोग में कमी आ रही है, ऐसे समय में मातृभाषा शिक्षण का महत्व और भी बढ़ जाता है। बच्चों को अपनी भाषा बोलने, समझने और लिखने के लिए प्रेरित करना हमारी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

“मातृभाषा हमारी पहचान है”

कार्यक्रम से जुड़े भूपेन्द्र सिंह देव ‘ताऊजी’ ने कहा कि मातृभाषा केवल शब्दों और बोलचाल का माध्यम नहीं है, बल्कि यह हमारी संस्कृति, परंपरा, लोकस्मृति और सामाजिक पहचान का आधार है। यदि हम अपनी मातृभाषा को अगली पीढ़ी तक नहीं पहुंचाएंगे तो आने वाले समय में हमारी अनेक लोकपरंपराएं और सांस्कृतिक विरासत भी धीरे-धीरे विलुप्त हो सकती हैं।उन्होंने कहा कि चम्पावत जनपद में सात केन्द्रों के माध्यम से भाषा शिक्षण से जुड़े सभी शिक्षक पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ कार्य कर रहे हैं। नई दिल्ली में होने वाला सम्मान समारोह इन शिक्षकों के साथ-साथ चम्पावत की लोकभाषा और लोकसंस्कृति का भी सम्मान है।

चम्पावत के लिए गौरव का अवसर नई दिल्ली के मंच पर चम्पावत /अल्मोड़ा के 17 शिक्षकों की सहभागिता जनपद के लिए गौरव का विषय है। यह सम्मान उन सभी शिक्षकों, अभिभावकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और भाषा प्रेमियों को समर्पित है, जो उत्तराखण्ड की लोकभाषाओं को जीवंत बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयास कर रहे हैं।कार्यक्रम के आयोजकों का उद्देश्य स्पष्ट है कि उत्तराखण्ड की लोकभाषाएं केवल घरों तक सीमित न रहें, बल्कि विद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और नई पीढ़ी के बीच भी सम्मानपूर्वक स्थान प्राप्त करें।चम्पावत एवं अल्मोड़ा के इन शिक्षकों की नई दिल्ली में सहभागिता इस संकल्प को और मजबूती प्रदान करेगी कि कुमाउनी और गढ़वाली जैसी मातृभाषाएं हमारी आने वाली पीढ़ियों की आवाज भी बनी रहें।

“हमरि भाष–हमरि पच्यान",

मातृभाषा से मजबूत हो उत्तराखण्ड की शान।”

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