Monday 3rd of August 2026

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चंपावत:तीन साल बाद भी घिंघारुकोट सड़क के नाम पर इंतजार कंधों पर मरीज, पगडंडी पर जिंदगी और फाइलों में विकास'

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रिपोर्ट: लक्ष्मण बिष्ट : चंपावत:तीन साल बाद भी घिंघारुकोट सड़क के नाम पर इंतजार कंधों पर मरीज, पगडंडी पर जिंदगी और फाइलों में विकास'

Laxman Singh Bisht

Mon, Aug 3, 2026

तीन साल बाद भी घिंघारुकोट सड़क के नाम पर इंतजार कंधों पर मरीज, पगडंडी पर जिंदगी और फाइलों में विकास'

घोषणा मुख्यमंत्री की सजा ग्रामीण भुगतें क्यों?

चंपावत : मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने वर्ष 2024 में पाटी विकासखंड के सुदूरवर्ती तोक घिंघारुकोट को चार किलोमीटर सड़क से जोड़ने की घोषणा की थी। घोषणा ने उम्मीद जगाई थी कि अब पहाड़ के इस दुर्गम गांव की पीढ़ियों पुरानी परेशानी खत्म होगी। लेकिन तीन साल बाद सवाल यह है कि सड़क कहां है?मुख्यमंत्री की घोषणा अगर शासन की प्राथमिकता थी तो विभागीय फाइलों की रफ्तार इतनी सुस्त क्यों रही? क्या किसी गांव तक सड़क पहुंचाने में तीन साल भी कम पड़ते हैं? और यदि घोषणा के बाद भी ग्रामीणों को वही उबड़-खाबड़ रास्ता, वही पगडंडी और वही जोखिम उठाना पड़ रहा है, तो फिर विकास के दावों की असली तस्वीर क्या है?आज भी घिंघारुकोट के बच्चे इसी दुर्गम रास्ते से स्कूल जाते हैं। बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं के लिए यह रास्ता मजबूरी है। बीमार पड़ने पर परिजनों को मरीजों को "कंधों पर उठाकर मुख्य सड़क तक लाना पड़ता है।" इससे अधिक शर्मनाक तस्वीर ‘आदर्श चम्पावत’ के लिए और क्या हो सकती है?सबसे बड़ा सवाल विभागीय जवाबदेही का है। ग्रामीणों ने अधिकारियों के दरवाजे खटखटाए, अपनी पीड़ा बताई, लेकिन समाधान के बजाय आश्वासन मिलते रहे। क्या सरकारी व्यवस्था में ग्रामीणों की जिंदगी और उनकी सुरक्षा की कोई समयसीमा तय नहीं?यह सिर्फ चार किलोमीटर सड़क का मामला नहीं है। यह उस व्यवस्था की परीक्षा है, जो मुख्यमंत्री की घोषणा को जमीन पर उतारने का दावा करती है। "मुख्यमंत्री संवेदनशील हैं तो विभाग इतना संवेदनहीन क्यों?"सरकार ‘रिवर्स विलेज’ और पलायन रोकने की बात करती है। लेकिन गांव तक सड़क ही नहीं पहुंचेगी तो रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बाजार की सुविधाएं कैसे पहुंचेंगी? जिस गांव में बीमार व्यक्ति को सड़क तक पहुंचाने के लिए कंधों का सहारा लेना पड़े, वहां पलायन रोकने के दावे कितने प्रभावी होंगे।यह सवाल सरकार और विभाग दोनों से पूछा जाना चाहिए।अब घिंघारुकोट को एक और आश्वासन नहीं, "जवाब चाहिए—सड़क कब बनेगी?" मुख्यमंत्री की घोषणा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? और यदि घोषणा के तीन साल बाद भी काम जमीन पर नहीं उतरा तो "लापरवाही के लिए जवाबदेह कौन है?"क्योंकि विकास की असली तस्वीर सरकारी विज्ञापनों में नहीं, "उस आखिरी गांव की सड़क पर दिखाई देती है, जहां आज भी लोग कंधों पर जिंदगी ढो रहे हैं।"मामले मे लाेक निर्माण विभाग लोहाघाट के अधिकारियों ने बताया बन विभाग की अनापत्ति के लिए फाइल को केंद्र में भेजा गया है। बन आपत्ति व धन की स्वीकृति मिलते ही सड़क का निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा।

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